ले बेटा आज अपनी ही माँ को पेल दे। तेरे बाप का तो खड़ा ही नहीं होता। लेकिन माँ..

“नहीं बहु तेरा देवर बहुत शरीफ हैं॥ गलत काम कर ही नहीं सकता, लेकिन माँ रात को  ..

सुबकती हुई हीरा के आंसू साड़ी के पल्लू से पौंछते हुए मां गंगा ने कहा” तू चिंता ना कर बहू। तेरे साथ में कुछ भी गलत ना होने दूंगी! आज रात में सारी सच्चाई खुद देखूंगी।
मगर … मां… जी… तुम …..खुद देखोगी।  पर कैसे..?? हीरा ने आंसू पोंछते हुए अपनी सासू मां से प्रश्न किया? तू कैसे को छोड़…. और जैसा मैं कहती हूं …तू वैसा कर समझी ! आज रात तू मेरे कमरे में मेरे बिस्तर पर सो जा और मैं तेरे कमरे में तेरे बिस्तर पर सो जाऊंगी! हीरा मां की इन बातों से भौंचक्की रह गई । मां अपने बेटे को पकड़ना चाहती है या मेरी सत्यता जांचना चाहती  हैं !

असुरक्षा के भाव को दूर करने की कोशिश

पर मुझे कोई डर नहीं.. बात तो सच ही थी ना जो मैंने मां को बताया!! पर अगर कहीं शेरा को पता चल गया तो क्या करेगा …पता नहीं??तभी मां ने कहा…  समझ गई बहु ….अब तू जा ..और मैं भी चलूं..!! बहू और मां ने कमरे के साथ अपनी साड़ी और बिस्तर भी बदल लिए। रात्रि का लगभग एक बजा था। घर के सभी लोग सो चुके थे । परंतु मां की आंखों में नींद न थी। वह समय के कटने का इंतजार कर रही थी।

मन ही मन सोच रही थी। काश बहू की बात गलत हो जाए,तो मैं कल उसकी खबर लूंगी! मेरे बेटे पर कितना गंभीर आरोप मढ़ा है इसने ! पर बहू भी तो झूठ नहीं बोलती और फिर विधवा है बेचारी..! तो ऐसी वैसी बात भी ना कहेगी !  जो  होगा आज मैं खुद अपनी आंखों से देखूंगी। सोच ही रही थी कि खिड़की के खड़कने की आवाज आई।

 

 

ले बेटा अपनी हवस शांत कर ले ॥ पर माँ भाभी .. ?

मां चादर ओढ़े लेटी थी। पंखा तेजी से चल रहा था । तभी खिड़की से कमरे में अंदर किसी के कूदने की आवाज आई। किसी के पदचाप उसकी ओर बढ़ चले आ रहे थे । तभी मां को लगा उसकी चारपाई पर कोई बैठा और उसे दबोच लिया। गंगा ने झट से चादर हटा कर उसको धक्का दिया ।धक्का देने से वह आदमी अलग गिरा । गंगा फुर्ती से उठी। तभी किसी ने उसे पीछे से पकड़ कर कहा …अब जाती कहां है..?

बहुत दिनों से बहाने बना बना कर मेरा खून जला रही है..? आज ना मानूंगा…? आज तू कुछ भी कर ले.. सब सो रहे हैं… और सुन .अगर तूने जरा भी चिल्लाया तो मैं …इस पिस्तौल से तुझे गोली मार दूंगा! लड़खड़ाते हुए उस आदमी ने कहा..!तभी गंगा ने उससे थोड़ी हुज्जत की… और किसी तरह छूटकर लाइट जलाई..! लाइट की रोशनी में शेरा ने जब गंगा को देखा तो हतप्रद रह गया! मां …तू यहां?क्यों …क्या हुआ… अब आ… ना… ले चल मुझे.. बिस्तर पर ….कर ले

 

अपनी मनमानी.. वाह बेटा… वाह.. मां अपने बेटे के जन्म पर जितना खुश होती है …उतना ही मैं आज तेरी इस करतूत पर शर्मिंदा हूं । काश तू पहले ही मर गया होता। पर …मां… मैं …शराब के नशे में हूं। वाह बेटा… वाह… अपने कुकर्म को छुपाने के लिए एक और कुकर्म की दलील.!! अगर तू शराब के नशे में था तो बहू के कमरे तक कैसे चला आया? मेरे कमरे में क्यों नहीं घुसा ..?

अगर तू शराब के नशे में था… तो तुझे खिड़की कैसे समझ आई ..? बहू का बिस्तर कैसे दिख गया…? तू अपनी हवस में इतना अंधा हो जाएगा मैंने कभी सोचा भी न था ..!! तुझ जैसे नीच की मां होने से अच्छा होता मैं बांझ ही रह जाती।

पर मां हीरा ही मुझे बुलाती थी… विधवा है ना बेचारी.. तो शायद उसे भी !!आगे अपनी गंदी जुबान से कुछ अपशब्द बोलता तब तक गंगा ने दो तीन चांटे उसके गाल पर रसीद कर दिए..!
शेरा चिल्लाया…. मां… अब अगर तूने मुझे मारा तो… मैं भूल जाऊंगा कि तू मेरी मां है ..! यह कहते हुए उसने अपनी पिस्तौल गंगा पर तान दी!

अच्छा तो तू मुझे मारेगा मार… तू आज मुझे मार ही डाल..! यह नेक काम भी कर ही दे आज .! अच्छा होगा बहू की इज्जत बचाने में.. मैं मर जाऊं! दोनों लोगों की तेज आबाजों ने घर के सभी सदस्यों को जगा दिया।

 

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सभी लोग बहू के कमरे की ओर दौड़े। कमरे के दृश्य को देखकर सभी के पांव की जमीन खिसक गई। हीरा यह सब देख रोने लगी। वह सोचने लगी …क्या फायदा ऐसी इज्जत बचाने का…! जिसकी खातिर उसकी मां की जान ही चली जाए.! अगर मां ही ना रही तो मैं भी कैसे जिऊंगी..? यही तो मेरा सहारा है इस घर में …! तब फिर कौन मेरी इज्जत बचाएगा..! वह तो लुट ही जाएगी ना।वह दौड़ी और झट से मां के आगे आकर खड़ी हो गई। शेरा अगर मारना ही है तो मुझे मार दे… पर मां को कुछ ना कह..! देख यह तेरी मां है..! मैं पराए घर की हूं..! मैं मर गई तो… तेरा घर बचा रहेगा..! तू दूर हट जा वैश्या..!

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यह सब तो तेरी ही वजह से हो रहा है । तूने ही इस घर में आग लगाई है । अब हम सबको नाटक करके दिखाती है।शेरा के मुंह से ऐसे बेशर्मी भरे शब्दों को सुनकर उसके पिता का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया । उसने झट से शेरा की पिस्तौल पकड़ी और दूर फेंक दी और अपनी छड़ी से उसको पीटने लगे और बोले नालायक..

अरे बापू भाभी अभी जवान हैं ” बाहरी कुएं के पास से अच्छा हैं ” की  घर में ही  ..

हमारे खानदान में तुझसा कपूत कोई पैदा नहीं हुआ। तेरी आंखों में जरा भी शर्म है… तो मर जा कहीं जाकर.. हमें तेरे मरने का तनिक भी अफसोस ना होगा। अरे बापू…. तुम भी शुरू हो गए… तनिक मेरी भी तो बात सुनो …तुम भी मुझे अम्मा की तरह बेवकूफ समझते हो.. जरा ठंडे दिमाग से सोचो बापू ….हीरा की भर पुर जवानी उस पर ये विधवापन..?

क्या काम वासना न इसे जलाएगी। तब फिर उस आग को ठंडा करने के लिए किसके पास न जाएगी। किसी बाहरी कुएँ के पास जाकर प्यास बुझाऐ तो उससे आपकी ही बदनमी होगी।अच्छा हैं, की इसकी आग यही बुझती रहे।ऐसे घिनौने तर्क को सुनकर शेरा के बापू ने आगे बढ़कर उसके सिर के बाल पकड़ लिए और कहा… वाह…. बेटा ….. वाह…! इससे घटिया सोच तेरी हो भी नहीं सकती…!  तू क्षत्रिय नहीं है… जो शेर की तरह जिये।अरे तेरा नाम शेरा रखा. पर तू तो गीदड़ निकला रे…!

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जो मरे हुए जानवरों को नोच नोच कर खाते हैं..! तू भी दुख की मारी अपनी विधवा भाभी के बारे में इतने गंदे विचार रख कर उसे नोच नोच कर खाना चाहता है..!! अच्छा तो तब लगता जब… क्षत्रियों की तरह तू  इसका बेटा बनकर उन गीदड़ों से लड़ता जो इसकी ओर कुदृष्टि डालते..! तू तो मेरा शेर था ना… पर ….

तू अब चल और अपनी भाभी के चरणों में गिर कर इससे माफी मांग….. कहते हुए शमशेर सिंह ने शेरा को उसके चरणों में धकेल दिया…!पैरों में गिरा शेरा …अंदर ही अंदर धधकने लगा ।
बाबूजी बोले… बेटी मैं शर्मिंदा हूं ….और अपने नालायक बेटे की तरफ से तुझसे क्षमा चाहता हूं..! यह बात घर से बाहर कभी किसी को ना बताना..! वरना हमारी इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी। यह कहते हुए बाबूजी तेज कदमों से कमरे से बाहर चले गए!
शेरा भी अकड़ कर बाहर निकल गया और हीरा मां के गले लग कर रोने लगी।

तभी मां ने कहा…. तू रो ना बेटी… तेरे लिए मैं हूं ना अभी….. मरी नहीं हूं । मेरे रहते तुझे कुछ ना होगा!हीरा बोली मां तुम हमेशा मेरे साथ रहना..! भगवान मेरी उम्र भी तुम्हें दे दे..!!रात किसी तरह कटी । अगली सुबह हुई। मगर शेरा अभी भी अपमान की आग में जल रहा था…! रात के अपमान ने उसे चोटिल बना दिया था..! वह अपने अपमान का जल्द से जल्द बदला लेना चाहता था ! उसने गांव के अपने नीच साथियों को एकत्र किया फिर उनको शराब पिलाकर कुछ समझाया।
दो-तीन दिन घर में शांति बनी रही। पर यह शांति तो तूफान आने से पहले वाली शांति थी।

बेटा अपनी विधवा भाभी को छोड़ दो ॥ वो ..

एक सुबह हीरा और उसकी मां दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होने के लिए खेतों की ओर गई। खेतों में फसल खड़ी थी। जैसे ही वे दोनों खेतों में पहुंची कुछ लड़के खेतों से निकल आए और हीरा को पकड़ने लगे । हीरा के साथ होते दुर्व्यवहार को रोकने के लिए जैसे ही उसकी मां ने उन्हें उल्टा सीधा कहा.. शेरा ने पीछे से आकर अपनी मां को पकड़ लिया और मुंह पर कपड़ा के साथ उसके हाथ-पांव भी बांध दिए..!!  मां ने छूटने की भरपूर कोशिश की मगर सब बेकार गई..! अब तो मुंह से आवाज भी न निकल पा रही थी..! हीरा डर से थर थर कांपने लगी …!

तभी शेरा ने एक स्प्रे निकाला और हीरा के मुंह की ओर स्प्रे किया। थोड़ी देर में हीरा बेहोश हो गई । अब इन दुष्टों का काम और आसान हो गया। मां की आंखों के सामने उसकी प्यारी बहू के साथ दरिंदगी की सारी हदें पार होती रही।  उसके शरीर को बारी-बारी से रोंद दिया गया । बेचारी मां… देखने और आंसू बहाने के अलावा कुछ ना कर सकी। उसकी आंखों के सामने उसके बेटे और उसके नालायक साथियों ने शराब पी

 

 

और वहां से निकले तभी कुछ दूर जाकर शेरा अपने साथियों के साथ पुनः पलटा और मां के पास आकर उसको ठोकर मारते हुए बोला… देख बुढ़िया तूने देख लिया… शेरा का बदला… मैं जमींदार खानदान का शेर हूं…

और तू एक औरत…..मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। मैंने तेरी आंखों के सामने ही तेरी बहू से दुराचार किया और तू …सिवा आंसू बहाने के कुछ न कर सकी..! और अब कुछ कर भी नहीं सकती….. क्योंकि मैं तेरा… इकलौता बेटा रह गया हूं …अगर मुझे कुछ हुआ तो तेरा वंश नष्ट हो जाएगा । तेरी चिता को आग देने वाला भी कोई ना बचेगा और अगर तूने पुलिस से कुछ कहा तो अब की बार तेरी इज्जत पूरे गांव के सामने…. समझ गई ना।

 

 

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बेचारी गंगा के लिए इससे शर्मनाक क्षण और कोई ना हो सकता था क्योंकि एक मां के लिए इस परिस्थिति को फेस करना आसान न था …!! उसने आंख बंद की और मन ही मन कुछ संकल्प किया पर क्या …..यह कोई नहीं जानता था.! पर इतना जरूर है कि संकल्प में बड़ी शक्ति होती है।हीरा तो पहले ही मर चुकी थी। उसके शरीर से निकलता खून और शरीर पर पड़े निशान उसके साथ होने वाले वाली जघन्य

कृत्य की कहानी खुद ब खुद बयां कर रहे थे। सारा खेल खत्म हो चुका था। मगर मां भी करे तो क्या करें ? वह अब बेबस थी। वह सोचने लगी कैसे राक्षस को जन्मा है मैंने…???? जिसने अपना घर ही उजाड़ दिया।  वह भी मेरे सामने… और मैं कुछ ना औरत कितनी बेबस होती है एक औरत…!

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हीरा के शरीर से निकलता रक्त …. और मां के आंखों से बहते आंसू ….सुबह की बेला को बहाए लिए जा रहे थे। जब काफी समय बीत गया तो शेरा के बापू को कुछ संदेह हुआ  वह उन दोनों को देखने खेतों की ओर गए। कुछ देर ढूंढने के उपरांत …..उन्हें रक्त रंजित हीरा की अर्धनग्न अवस्था में पड़ी लाश मिली। हीरा के शव को देखकर उनका कलेजा कांप उठा ।

झट से उन्होंने अपनी पगड़ी खोल कर उसके ऊपर डाली..! उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरी पगड़ी… मेरी बहू का कफन बनेगी दूसरी तरफ जब निगाह घुमा कर देखी तो गंगा बंधी पड़ी थी । गंगा की ऐसी हालत देखकर उनकी आंखों से आंसू बह निकले । उसने तुरंत उसे खोला। गंगा अपने पति के गले लग कर रोने लगी और बोली… हम बर्बाद हो गए..! हम अपनी विधवा बहू के साथ न्याय ना कर सके।

आखिर तुमलोगों के साथ गलत काम किसने किया॥ बताओ उसका .. ?

पर कुछ बताओ भी …आखिर हुआ क्या… किसने किया …..यह सब….??? सुनो जी…. अब अपनी बहू को अपने कांधे का सहारा दो और ले चलो इसे..!!हीरा के बापू ने हीरा को अपने कंधों पर उठाया और घर की ओर ले चले। ठाकुर साहब को अपनी विधवा रक्तरंजित बहू को यू कांधे पर लटका कर लाता देख गांव के सभी लोग इकट्ठे होने लगे । हीरा के साथ दुराचार और उसकी मौत की खबर आसपास के सभी गांव में फैल गई। सभी लोग हतप्रभ थे कि बड़े घर की बहू के साथ ऐसा जघन्य अपराध करने की हिम्मत किसने की…???  मगर किसी की समझ में कुछ नहीं आ पा रहा था।
लोगों के साथ… हीरा के बापू ने कहा… गंगा क्यों ना हम अज्ञात लोगों के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दे। जिससे हमारी बहू के साथ हुए अपराध के अपराधी को सजा दिलाने में मदद मिलेगी..!गंगा ने कहा… छोड़ो हम क्यों पुलिस के झगड़े में पड़े..! हमारी इज्जत पहले ही मिट गई अब और फजीहत ना होने दूंगी..!

इसका जल्द से जल्द दाह संस्कार करा दीजिए..!ठाकुर शमशेर सिंह ने हीरा का दाह संस्कार करा दिया। कोई भी ठाकुर साहब के फैसले के विरुद्ध कुछ न कह सका ।
दाह संस्कार के बाद उस रात्रि घर में सन्नाटा पसरा था। तभी शेरा अपने घर आया और अपने कमरे में चला गया। कमरे में पहुंचकर वह अपने बिस्तर पर लेटा ही था कि अचानक उसके कमरे का दरवाजा खुला। देखा.. उसकी मां …उसके सामने खड़ी है…!
वह बोली… शाबाश बेटा… उस कुलक्षिणी को तूने अच्छा सबक सिखाया। वह बहुत जोर से हंसी… हा.. हा.. हा… अच्छा हुआ वह मर गई.. वरना हम सबके लिए मुसीबत बनी रहती..! आ मेरे गले लग जा।शेरा उठा और मां के गले लग गया। मां ने उसे प्यार से सहलाया और कहा… अब तू आराम से सो जा..! अब आज तुझे चैन की नींद आ जाएगी.!

Rape Cases में राजस्थान देशभर में नंबर वन, प्रतिदिन औसतन 15 केस हो रहे हैं दर्ज-NCRB - in rape cases rajasthan number one across country national crime records bureau rjsr – News18 हिंदी

मां के बदले स्वरूप से शेरा भौचक्का रह गया। पर मां तो मां होती है.. अपने लड़के का कभी बुरा नहीं चाहती..! वह मन ही मन सोचने लगा..! मां वहां से चली गई !
थोड़ी देर में वह शमशेर सिंह के कमरे में गई।
इतनी रात गए गंगा तू यहां क्या करने आई है… शमशेर सिंह ने कहा
गंगा क्या कर सकती है.. सिवा पाप धोने के…!
पाप धोने के… किसका पाप… तू क्या कह रही है.. मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा…
मगर गंगा सब जानती है …ठाकुर साहब… पाप करने वालों को भी और पाप धोने वालों को भी..! उसने शमशेर सिंह की बंदूक उठाई… उसमें दोनों कारतूस डाले और लेकर चल दी.!
अरे गंगा यह कोई खिलौना नहीं…. जो तू इसको लिए जा रही है… यह बंदूक है… बंदूक… इससे गोली चल जाएगी! हां ..हां… मैं भी क्षत्राणी हूं …मैं भी जानती हूं… इस बंदूक और गोली को..!
पर तू …..
तुम पीछे हटो ना …आज मुझे अपना धर्म निभाने दो।

तेरे जैसा बेटा को जीने का  कोई हक नहीं ॥ मैं अभी तुझे .. ?

वह चली और शेरा के कमरे में जा पहुंची। लाइट जलाई.. तो शेरा चौंककर उठ बैठा ..! मां के हाथ में बंदूक और पीछे बाबूजी को खड़ा देखा। मां… वह घबराया और बोला… अरे बाबूजी देखो.. मां बंदूक….
हां …हां.. बंदूक… तू क्या समझता है तू मनमानी करेगा? तेरा खून खून है… हीरा का खून खून न था ..!तेरे अंदर ही ज्वार उठता है? पर तू नहीं जानता जब एक मां के अंदर ज्वार उठता है… तो प्रलय आ जाती है।तूने क्या कहा था… तू जमीदार कुल का शेर है..! तो सुन मैं भी उस कुल की देवी हूं और सवारी शेर नही देवीदेवी की करती हूँ। हां एक बात और सुन ले शेरा…

जब कुत्ता या शेर पागल हो जाता है… तो उसे गोली मार दी जाती है..! ताकि वह समाज के लिए खतरा ना बन जाए और तू वही पागल कुत्ता है ..!तू तो शेर भी नहीं है। तू अब इतना ताकतवर हो गया कि अपनी मां की इज्जत सरेआम उछालेगा।  जमींदार खानदान की तेरी मां की इज्जत बचाने के लिए तेरे बापू है …अभी मेरा सुहाग जिंदा है।   तुझे मैंने जन्म दिया है.. तो मृत्यु भी मैं ही तुझे दूंगी …!

और क्या कहता था.. तू… कुलदीपक है.. तो सुन दीपक जलता है और उसे जलने दिया जाता है… पर जब वह दावानल बन जाता है। तो उसे बुझाना ही पड़ता है..! आज मैं अपने इन्हीं हाथों से इस दावानल को बुझा दूंगी..! जिसने मेरे घर को जलाकर खाक कर दिया ! उसकी लपटें हम दोनों की तरफ पहुंचे इससे पहले उसको बुझाना जरूरी है! गंगा शांत रही… पर तू अपने पाप धोता रहा.. आज गंगा तुझ जैसे पापी को बहाकर तेरा अंत कर देगी। उसने इतना कहते ही दोनों गोलियां शेरा के सीने में दाग दीं।शेरा वहीं ढेर हो गया। शमशेर सिंह यह सब देखकर हतप्रभ रह गया

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गंगा ने कहा… सुनो जी।अब यह पश्चाताप का नहीं… पापियों के नाश का समय है। शुरुआत मेंने अपने बेटे से कर दी है ।अब यह बंदूक लो और उन पापियों को दंड दो जिन्होंने मेरी बेटी की इज्जत मेरे सामने तार तार की..! गंगा की बातें शमशेर समझ चुका था। वह समझ गया कि सारी वारदात गंगा के सामने शेरा ने ही कराई होगी । उसने गंगा के सिर पर बड़े प्यार से हाथ रखा और कहा.. गंगा तू सचमुच महान है .! एक पराई बेटी के लिए तूने अपने बेटे को दंड देने में जरा भी देरी नहीं की

करती भी कैसे …उस दिन उस नीच को छोड़ने का ही यह परिणाम निकला। कोई मां अपने लड़के से ऐसे कुकर्म की उम्मीद नहीं करती। आज मैं हार गई हीरा के बापू। मेरा सब कुछ लुट गया। मैं तुम्हारी अपराधी हूं.. जो तुम्हें ऐसा कपूत दिया ..! वह उसके पैरों में गिरकर शेरा के लिए माफी मांगने लगी।

पंचायत का फैसला

माहौल काफी गमगीन हो चला था। शमशेर सिंह ना तो  रो पा रहा था और न कुछ कह पा रहा था। सिर्फ अंदर ही अंदर एक अजीब सी घुटन महसूस कर रहा था। उसने गंगा को उठाकर कहा… गंगा कसूर अकेले तेरा ही नहीं बेटा तो मेरा भी था।अगले दिन यह उसने गंगा द्वारा बताये नामों वाले व्यक्तियों को ढूंढकर पंचायत के सम्मुख पेश करने का ऐलान किया। आज आसपास के गांव के लोगों को अपने परिवार के साथ आने का निमंत्रण शमशेर सिंह ने भेज दिया। सभी लोग हैरान थे कि… आखिर किस कारण परिवार सहित पंचायत की जा रही है ..! पर ठाकुर साहब का हुक्म सर माथे ।

कोई क्या कहता..? सभी लोग पंचायत के लिए एकत्र हो चुके थे।
ठाकुर शमशेर सिंह ने पंचायत में हीरा के साथ होने वाले जघन्य  अपराध की बात विस्तार से बताई और यह भी बताया कि इस घटना में कौन-कौन लोग शामिल थे। जिन्हें जल्द से जल्द पंचायत के सामने प्रस्तुत करना है और फिर सभी के निर्णय से दंड दिया जाएगा।कुछ लोगों ने दबे स्वर में  कहा… पर ठाकुर साहब इसमें सबसे ज्यादा गलती तो आपके बेटे की है ..!

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सबसे पहले सजा तो उसे ही मिलनी चाहिए।ठाकुर साहब ने अपने शागिर्दों को अंदर से चारपाई उठाकर लाने का आदेश देते हुए कहा…. आप लोग बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। बड़ी गलती वाले को बड़ी सजा मिलनी ही चाहिए ।आप लोग उस चारपाई की तरफ देखें.. फिर बताएं न्याय ठीक हुआ या नहीं..! सभी की निगाहें चारपाई की ओर गई तो दांतो तले उंगली दवा ली। शेरा मरा पड़ा था ।

घूंघट कर महिलाएं.. गंगा के साथ बैठी थी..!  अब किसी को कुछ भी ना कहना था। वह समझ चुके थे कि बचे हुए लोगों के साथ क्या होने वाला है। ठाकुर शमशेर सिंह ने कहा .. फुलेसरी तू अपनी लड़की की ओर देख… अगर तेरे बिटिया के साथ ऐसा हो तो तुझे कैसा लगेगा… और रमसुखिया तू तो… बाल विधवा थी… इसी गांव की बेटी थी…. क्या तुझे कभी किसी ने गलत निगाह से देखा…!

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पर आज मेरे घर से उठी चिंगारी  कल आग बन जाती। यह गांव, क्षेत्र कामवासना में जलने लगता। मैंने चिंगारी दबा दी। पर अभी कुछ सुलगते अंगारे बाकी है। उन्हें भी बुझाना जरूरी है । ढूंढो अंगारों को और या तो खुद बुझा दो और या पंचायत बुझा देगी। गंगा की तरह पाप को बहाना सीखो।

अपने बच्चों के नाम सुनकर उनके मां-बाप का सिर पंचायत के सामने शर्म से झुक गया। कुछ ही दिनों में उन अंगारों को खोज लिया गया और उनकी मां ने दुर्गा के नव रूपों की भांति.. उन दुष्टों का संहार कर दिया …जिन्होंने गांव की अस्मिता पर कीचड़  उछाल कर उसे गंदा कर दिया था ..!आज उनके खून से गांव और क्षेत्र फिर से पवित्र हो गया ..!

समाज के लड़कों में साफ संदेश पहुंच चुका था कि समाज की बहू बेटियों के विरुद्ध होने वाले जघन्य अपराधों को पंचायत ही नहीं घर वाले भी बर्दाश्त न करेंगे..! भय वश ही सही पर दोबारा ऐसी घटना उस क्षेत्र में फिर कभी ना हुई।पाठकों अगर ये कहानी पसंद आया हैं” तो आप हमें follow जरूर करे। और अपनी राय देना मत भूले॥ धन्यवाद दोस्तों 👋👋👋