किन्नर का ” प्रेम ( एक दर्दभरी कहानी ) जो आपके आँखों में आँसू ले आएगा ?

किन्नर का “प्रेम

कानपुर से चली ट्रेन ने रफ्तार पकड़ ली थी । परेशान साहब सिंह भी चाहता था। कि वह जल्द से जल्द लखनऊ पीजीआई पहुंच जाए।

इधर ट्रेन की बढ़ी स्पीड के साथ जनरल कोच में बैठे साहब सिंह को कुछ तालियों के साथ-साथ हाय हाय की आवाजें सुनाई दी। उसने जब अपनी आंखों को इधर-उधर दौड़ाया।

तो उसने लोगों के चेहरे पर मुस्कान और प्रसन्नता के भाव देखे ।

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कुछ लोग तो खड़े होकर आगे बढ़कर इनको देखने के लिए उत्सुक हो रहे थे।

तभी चार पांच किन्नरों का एक समूह उनके कंपार्टमेंट में उसकी सीट के नजदीक आया। और तालियां पीट पीट कर लोगों से पैसे मांगने लगा।

कुछ लोग मुस्कुराकर पचास तो कुछ उनसे मनोरंजन करके सौ रुपए दे रहे थे। कुछ लोग ऐसे भी थे। जो रुपए देने में संकोच कर रहे थे,

किंतु अपने तालियों के साथ हाय हाय करते किन्नरों में से कुछ उसके सिर पर हाथ फेरते , तो कुछ अपनी साड़ियों को थोड़ा ऊपर खिसका कर नंगा नाच करने की एक्टिंग से उनको डराते और उनसे रुपए निकलवा लेते।

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सामाजिक मर्यादाओं के कारण लोग ज्यादा विरोध किए बिना अधूरे मन से ही सही.. उन्हें रुपए दे देते । कोई भी किन्नरों की बद्दुआ लेना नहीं चाहता था। समाज में मान्यता है कि ..

.किन्नरों की बद्दुआ नहीं लेनी चाहिए। क्योंकि इनकी बद्दुआ लोगों का काफी अहित कर सकती है!  परंतु साहब सिंह यह सब नजारा देख रहा था । वह मन ही मन आशंकित था ,

कि अगर उसके पास आकर यह किन्नर इस तरह का व्यवहार कर करेंगे तो वह क्या करेगा..?

मैं पैसा क्यों दूँ,, मेरे घर में कौन सी खुशी हैं ?

तभी दो किन्नर उसके पास आए ।और अपनी तालियां उसके कानों के पास बजाने लगे। उसने उनकी तालियों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं की। किन्नरों ने उसको भी अपनी साड़ी ऊंची करके नंगा नाच करने की धमकी दी …पर उसने उनकी बातों का कोई उत्तर न दिया..! तभी तीसरे किन्नर ने उसकी जेब में हाथ डाला…

तो उसने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा… क्या बात है ….? कोई जबरदस्ती है क्या…? जिसने खुशी से दे दिया… वही ले लो …!

उसकी रूखी बातों से किन्नर चिढ गए । और उसे उल्टा सीधा बोलने लगे । साथ ही उसे बद्दुआ देने लगे।

बेचारा साहब सिंह आंखों में आंसू लिए उन से विनती करने लगा…

तुम्हें किसी से जबरदस्ती करने का, उसे भला बुरा कहने का …कोई अधिकार नहीं हैं! मेरे घर परिवार में कौन सी खुशी आई है …

जिससे मैं तुम्हें पैसे दूं…! मैं तो पहले से ही परेशान हूं…! पर तुम्हें किसी की परेशानी से क्या..?

तुम्हें तो इससे भी कोई मतलब नहीं कि सामने वाले पर पैसे भी हैं या नहीं..?
और अगर है भी …तो वह किस काम के लिए जा रहा है ? लिंग से ही नहीं.. दिल से भी अधूरे हो तुम लोग…! तुम्हें समाज और सामाजिकता की कोई परख नहीं हैं । तुम्हें तो सिर्फ पैसा ही दिखता है..! क्या करोगे इस पैसे का…!

तुम सिर्फ अपने लिए जीते हो… सिर्फ अपने लिए …..
उसकी इतनी कटु बातों को सुन किन्नर भड़क उठे । और उसको अपनी बदुआओं से छलनी करते हुए वहां से आगे बढ़ गए।
किन्नर ने मुझे पैसे क्यों दिए ?
तभी उसने देखा एक बहुत ही खूबसूरत सी दिखने वाली किन्नर उसके पास आई। और 10 रुपये का सिक्का उसे देते हुए बोली …रख लो..
ईश्वर तुम्हारी झोली धन-धान्य से भर दे..!

तुम्हारी मुसीबतें दूर करें…!ऐसा दृश्य देख साहब सिंह ही नहीं आसपास के सभी लोग दंग रह गए ।
किन्नरों के झुंड में से एक किन्नर ऐसी भी है ।

जो सचमुच मोम सा दिल रखती है । लोगों ने कहा.. रख लो बाबू …सुना है किन्नर से मिला पैसा व्यक्ति के घर परिवार में समृद्धि लाता है।
शायद यह किन्नर तुम्हारे दुख को भांप गई ।
मालूम होता है तुम्हारी बातों ने इसके दिल को पिघला दिया।

साहब से जाते वक्त उस किन्नर सुंदरी ने अपने साथियों के कृत्य के लिए क्षमा भी मांगी।
तभी मूकदर्शक बना साहब बोला… मुझे क्षमा करना….. दरअसल में काफी परेशान हूं ..! क्या हुआ…दरअसल मेरी पत्नी काफी बीमार है…! लखनऊ के पीजीआई हॉस्पिटल में भर्ती है!

डॉक्टरों ने ऑपरेशन बताया है ।मगर ऑपरेशन के लिए मेरे पास पैसे नहीं है। इंतजाम करने घर गया था। मगर हम गरीबों के लिए पैसों का इंतजाम होना बहुत मुश्किल है…!
कुछ पैसे ही पड़े हैं जिससे खाना पीना ही खाया जा सकता है…

इसलिए….ओह …तुम चिंता ना करो बाबू..! ईश्वर सबका है ..!हमारा भी और तुम्हारा भी..!
अब तुम अपना नाम भी बता दो मुझे … यदि उचित समझो तो…. नाम ..हां हां …बता रहा हूं।मेरा नाम कौन सा बहुत ख्याति प्राप्त है

जो मैं बताने से परहेज करूं! साहब.. साहब सिंह नाम है मेरा ।
साहब नाम सुनकर वह किन्नर चौकी…. और साहब जी.. आपके पिता का ।मेरे पिता का नाम राघव दास…!  मैं कानपुर में रहता हूं।
राघव दास सुनते ही वह वहां से चली गई।इधर वह हीरा किन्नर अपने समूह में पहुंची। तो किन्नरों ने उससे कहा …हाय हाय.. तू कहां रह गई थी! इन यात्रियों के चक्कर में ना पडा़ कर ..!

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यह कौन से हमारे नातेदार हैं। इनका तो रोज का आना जाना लगा ही रहता है। इनसे ज्यादा जुड़ाव मत रख । हमें तो सिर्फ पैसों से मतलब है। पैसों से…. चल भी अब ..!
बातों ही बातों में लखनऊ चारबाग स्टेशन आ गया। पैसे इकट्ठे करने के बाद किन्नर लोग अपने घर चले गए।
पैसों का इंतजाम हुआ की नहीं .. तो ?
इधर साहब सिंह भी अस्पताल पहुंच गया। जहां उसकी पत्नी पैसों की कमी और अपनी जिंदगी से लड़ रही थी। साहब डॉक्टर से मिला और पूछा…डॉक्टर.. कैसी तबीयत है मेरी पत्नी की ….??

तबीयत …पहले यह बताओ पैसों का इंतजाम किया कि नहीं …?
डॉक्टर साहब आप तो जानते हैं। हम लोगों के पास इतना पैसा नहीं है।और समाज में भी हमें अपनी हैसियत के मुताबिक ही तो उधार मिलेगा…?

कौन देता है हम गरीबों को उधार..? कौन मदद करता है पैसों की…?? तब तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी.!

जल्द ऑपरेशन न किया तो बीमारी गंभीर होती ही जाएगी और फिर जीवन बचाना भी मुश्किल हो जाएगा .. कहते हुए डॉक्टर ऑपरेशन थिएटर में चला गया !
साहब सिंह की आंखों में पानी के अलावा कुछ भी न था। सहारा देने वाला भी कोई नहीं था।

कोई ऐसा हाथ …जो इस संकट के समय सिर पर हो।वह भी नहीं था। बुजुर्ग माता-पिता …बेचारे सिवा ईश्वर से प्रार्थना के…क्या करते?
साथ आ जा भी नहीं सकते..!
इतनी भीड़ जो रेलगाड़ियों के सामान्य डिब्बों में है,कि उनका चढ़ना उतरना भी मुश्किल हो जाए ..!! क्या होगा मेरी पार्वती का…?
क्या करूं… दिमाग भी तो काम नहीं करता..? सच पैसा कितना जरूरी है जिंदगी के लिए …? बिना पैसे के जीवन भी बचाना मुश्किल है..! क्या मेरी पार्वती मेरी आंखों के सामने यूं ही दम तोड़ देगी!

कितने अरमान से उसके माता-पिता ने उसका हाथ मेरे हाथों में दिया था ! उसको भी कितना भरोसा था मुझ पर …कि मैं उसका हमेशा ख्याल रखूंगा!
उसका साथ दूंगा …! पर मैं …कितना लाचार और मजबूर हूं !उस से आंख मिलाने की हिम्मत भी नहीं है । मुझ में ..! मैं परिवार पालने चला था! पर अपनी पत्नी का बोझ भी ना उठा सका !
उसने क्या कुछ ना किया मेरे लिए… और मैं.. क्या कर सका..?? उसकी उम्मीद मुझसे है …और मैं.. ना उम्मीद होकर बैठा हूं।
प्रभु ” हम गरीबों को जन्म ही क्यों देता हैं ॥ जो  ?
हे प्रभु…. अब तू ही मुझे सहारा दे..! हम गरीबों का तो तू ही है! इन गरीबों को तू जन्म ही क्यों देता है… जब वे इतने बेबस होते हैं ? क्या तुझे भी हम पर दया नहीं आती…??
सब सोच सोच कर उसकी आंखों से आंसू बहे जा रहे थे । उसे अपनी पत्नी पार्वती की मौत के पदचाप सुनाई देने लगे। उसे लगा  कि मौत के पद चाप अब उसकी ओर बढ़े चले आ रहे हैं..
तभी किसी ने उसके सिर पर हाथ रखा…

अचानक से सिर पर रखे हाथ ने उसे चौंका दिया! उसने चौक कर पीछे मुड़कर देखा …अरे तुम…तुम यहां.. अभी तक पीछा नहीं छोड़ा..?
उसकी आंखों से बहते आंसू ने उसकी मुसीबतों को बयान कर दिया था।यह लो पैसे …और करा लो ऑपरेशन ! अब तुम चिंता ना करना साहब जी । मेरे होते मेरी भाभी को कुछ ना होगा …!

साहब सिंह को किन्नर की आवाज में कुछ अपनापन लगा।
उसे आज सब समाज की फब्तियां झेलने वाले एक किन्नर में देवी दिखने लगी । वह उसके पैरों में झुक गया । तुम्हारा नाम क्या है बहन …?

क्या करोगे मेरा नाम जानकर….. दुनिया मुझे हिजड़ा कहती है।अब तो मुझे यही ध्यान है बस…. अपना नाम तो जैसे भूल ही गई हूं मैं….भले ही लोग तुम्हें हिजड़ा कह कर हंसे …
पर मेरे लिए तो तुम कोई फरिश्ते से कम नहीं हो ना …और उस फरिश्ते का नाम तो पता होना ही चाहिए ना…!

हीरा नाम है मेरा…. हीरा सुनकर साहब चौंक पड़ा। वह किसी गहरी सोच में डूब गया। जब उसे होश आया तो वह हीरा किन्नर वहां नहीं थी ।
लोगों की भीड़ किन्नर को देख .. उस पर फब्तियां कस रही थी।
भीड़ में से किसी ने कहा….

लगता है इस किन्नर से इसने चक्कर चला रखा है। और यह किन्नर भी इसकी दीवानी लगती है। हाय …अगर यह खूबसूरत बला मुझे प्यार से देख लेती तो मैं भी निहाल हो जाता…!!
ना जाने कैसी कैसी बातें लोग कर रहे थे।
मगर साहब सिंह का मन और तन अब हीरा के चरणों में अपना समर्पण कर चुका था। साहब सिंह उठा और उन पैसों को लेकर डॉक्टर से संपर्क किया ।

डॉक्टर ने जल्द पैसे जमा कराने को कहा और स्वयं ऑपरेशन की तैयारी करने लगा। उधर साहब सिंह दिमाग पर जोर डालकर यह समझने का प्रयास कर रहा था ,
कि आखिर लोगों से पैसा लूटने वाले एक किन्नर ने आज एक असहाय व्यक्ति की मदद कैसे कर दी। पर वह कुछ समझ न पा रहा था।

वह अपने घर कानपुर लौटा तो उसने अपने माता-पिता को यह किस्सा कह सुनाया ।
एक किन्नर सुंदरी द्वारा अपने बिखरते और डूबते परिवार को मदद देकर पुनः बचाने के प्रयास ने माता-पिता को उस किन्नर को ढेरों दुआएं देने के लिए विवश कर दिया।
उन्होंने कहा …साहब… जब बहु अच्छी हो जाए…
हमलोग उस किन्नर सुंदरी से मिलन चाहते हैं ” जो मेरे बहु का प्राण वापस ले आई ?
हमें भी उस किन्नर सुंदरी से मिलाना.. जो हमारे परिवार के लिए एक फरिश्ता बन कर आई है।
हम भी उसका धन्यवाद करके उसके एहसानों का कुछ तो सिला दे सकें। जी बिल्कुल …कहकर साहब सिंह सोने के लिए बिस्तर पर चला गया। पर आज उसे नींद ना आ रही थी ।
बार-बार वह अपने सिर और कांधे को छूता..!

क्यों उसे एक अजीब सा और अपना सा स्पर्श लगा उस किन्नर के हाथों से..?? वह समझ ना पा रहा था..!मगर आज उसे एहसास हो चुका था।
कि प्रभु किसी भी रूप में मदद देने के लिए किसी भी जीव को अपने भक्तों तक अवश्य पहुंचा सकते हैं।

अब उसे पार्वती के प्राण बचने की उम्मीद जाग उठी थी ।
भोर हुई तो वह कुछ सामान लेकर पुनः अस्पताल पहुंच गया।पार्वती का ऑपरेशन हो चुका था ।

और तबीयत में सुधार होने लगा था । कुछ ही घंटों बाद नर्स ने साहब सिंह से कहा ….
सुनिए आप अब अपने पेशेंट से मिल सकते हैं!खुशी से फूला साहब तेज कदमों से पार्वती के बेड के पास पहुंचा।

और उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा.. अब कैसा महसूस कर रही हो पार्वती..?? आपका हाथ और साथ जब तक मेरे साथ है …भला मैं कैसा महसूस करूंगी…
यह तो आप भली-भांति जानते ही हैं ना..!! आपके होते हुए भला मेरे प्राण ईश्वर भी नहीं ले जा सकता…!!

ओह… कितना भरोसा है पार्वती को मुझ पर.. और मेरा भरोसा उस परमपिता पर…!! मैं  तुच्छ और गरीब इंसान भला किसी के प्राणों की क्या रक्षा कर सकता हूं..? वह मन ही मन सोचने लगा …!!
हां …हां …ठीक है… ठीक है… समझ गया..

पर तुझे पता है …यह सब कैसे संभव हुआ…?? कैसे और क्या से मुझे क्या लेना देना…? जो हुआ अच्छा हुआ …! आप के रहते सब अच्छा ही होगा । आप इतने सच्चे और अच्छे जो हैं।
पर पार्वती इसमें मेरा कोई रोल नहीं   दरअसल….तभी नर्स ने कहा… सर …

अब आप बाहर जाइए …मुझे पेशेंट को दवाएं देनी हैं । और इनके कपड़े बदलने हैं।साहब की जुबान पर किन्नर सुंदरी का किस्सा आने को बेताब था …मगर …वह फिर से अंदर ही रह गया ।
वह उसके एहसान को पार्वती और अन्य पेशेंट के समक्ष बताकर स्वयं उऋण होने की कोशिश भर कर रहा था!
मगर शायद उसे इस घटना को कुछ और समय तक अपने दिल में दबाए रखना होगा।उधर हीरा किन्नर ने ट्रेन में जाकर मांगना कुछ दिनों के लिए बंद करने का फैसला किया।

किन्नर सुंदरी ऐसा क्यों किया ,, जो ?
वह नहा धोकर तैयार होकर अपने देवता अरावन (इरावन) के सामने प्रार्थना करने लगी, कि वह साहब जी की पत्नी को अच्छा कर दे!
बदले में मेरे प्राण हर ले..!

दक्षिण भारत में किन्नरों को अरावन भी कहते हैं।दरअसल अरावन जो किन्नरों के देवता माने जाते हैं। यह अर्जुन एवं विधवा नाग राजकुमारी उलूपी के पुत्र हैं।
जिसे अर्जुन छोड़कर चले आए थे । और जब महाभारत का युद्ध हुआ। तो उस समय अरावन वहां पहुंच गया था। मां काली के सामने विवाहित नरबलि देने की शर्त की खातिर इसने अपने आपको प्रस्तुत किया था । परंतु वह विवाहित न था।

तब भगवान श्रीकृष्ण ने स्त्री का मोहिनी रूप रखकर इससे एक दिन का विवाह किया ।
और विवाहित होने की शर्त पूरी कर दी थी । बलि देने के कारण श्री कृष्ण बने मोहिनी ने विधवा होने पर अरावन के लिए अश्रुपूरित श्रद्धांजलि दी थी ।
प्रतिक्षण सच्चे दिल से निकली प्रार्थना ने एक बार फिर से चमत्कार किया।

पार्वती का स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन सुधारने लगा और सुंदरी किन्नर हीरा का स्वास्थ्य गिरने लगा।आज डॉक्टर ने पार्वती को पूर्ण स्वस्थ होने पर अस्पताल से कल डिस्चार्ज करने का निश्चय किया।
पर साहब सिंह सोचने लगा…

एक बार स्वयं पैसों से मदद करने के बाद सुंदरी किन्नर ने उसके लिए कुछ पैसे दोबारा अपने साथी से भेजे…
मगर वह स्वयं क्यों नहीं मिलने आई। कहीं उसे लोगों की बातों का बुरा तो नहीं लगा, लोगों की कुदृष्टि ने उसके दिल को चोट तो ना पहुंचाई होगी… कहीं वह मेरे और अपने संबंध को बदनामी से तो बचाना नहीं चाहती…
नहीं-नहीं बदनामी हो तो हो जाए …पर मैं जाने से पहले एक बार उससे जरूर मिलूंगा…! एक बार उसके पैर छूकर उसका धन्यवाद जरूर करूंगा ..!अभी तक तो सुना ही था कि किन्नर की दुआओं में असर होता है।

मगर अब तो साक्षात देख भी लिया कि  किन्नरों के दिल भी होता है।और वे जिसकी मदद करें उसका काम सफल भी होता है! एहसान को कम करने वाले तमाम विचार उसके मन को व्यतीत किए जा रहे थे। उसका मन सुंदरी किन्नर से मिलने के लिए बेताब हुआ जा रहा था।
उसने अपनी पत्नी को डिस्चार्ज कराया और कानपुर घर के लिए रवाना हुआ।

घर पहुंचते ही बहू को स्वस्थ देख माता-पिता काफी प्रसन्न हुए। उन्होंने साहब सिंह से कहा… बेटा …आज हमारे लिए बहुत खुशी का दिन है ,
कि हमारी बहू सकुशल स्वस्थ होकर घर वापस आई है ।

इसके लिए हम सभी शाम को मंदिर जाकर पहले ईश्वर का धन्यवाद कर उसे प्रसाद चढ़ाएंगे।
और कल हम उस देवी का दर्शन करने चलेंगे।

जिसने हमारे दुख को अपना समझ कर इस घर को बर्बाद होने से बचाया । साहब सिंह माता-पिता के वचनों का पूर्णतः पालन करने को तैयार हो गया।
शाम को सभी लोगों ने मंदिर जाकर प्रसाद चढ़ाया और
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किन्नर  सुंदरी क्यों नहीं आई ?
अगली सुबह लखनऊ के लिए ट्रेन से रवाना हुए।
आज साहब सिंह को किन्नरों के आने का इंतजार था ।वह चाहता था कि किन्नर सुंदरी उसे ट्रेन में ही मिल जाए।
तो वह सभी लोगों को न सिर्फ उसके दर्शन कराएगा। बल्कि उसकी नेक नियत के बारे में भी आसपास के सभी लोगों को बताएगा। उसकी आंखों में किन्नर सुंदरी की यादें तैरने लगी।

तभी किन्नरों की तालियों की आवाज उसे सुनाई दी। वह बेसब्री से उनके आने की राह देखने लगा।
जब किन्नर उसके समक्ष आए तो वह इधर-उधर निहारने लगा।

यह क्या …आज तो किन्नर सुंदरी उसे कहीं दिखाई ही नहीं दे रही ?
बाकी किन्नरों की टोली तो वही है.. पर वह ..क्या हुआ।उसने एक किन्नर को पार्वती के हाथ से 100 रुपये दिलाए और उनकी दुआएं लेने के उपरांत पूछा.. आज किन्नर सुंदरी नहीं दिख रही।
कौन…. हीरा ? हीरा…

पर मुझे तो उसका नाम मालूम नहीं ! वह जो मुझसे मिलने अस्पताल आई थी।

ओह …तो तुमसे मिलने गई थी हीरा….

बाबू वह तो तभी से बीमार है!बीमार है…. क्या हुआ? पता नहीं ….कुछ खोई खोई सी रहती है… ना कुछ खाती है ना पीती है….
कुछ सोचती रहती है ..कुछ बदली बदली सी रहती है।प्लीज …तुम मुझे उसका पता बताओ..! हम सब उससे ही तो मिलना चाहते हैं!
बाबू हम किन्नरों से कोई नहीं मिलने आता ॥ नहीं तो .. ?
हम किन्नरों से मिलने कोई नहीं आता बाबू ….
तुम भला क्यों मिलना चाहते हो उससे….?  हमारी दुनिया रीति रिवाज सब अलग हैं ।अरे ऐसा अनर्थ ना करो हमारे साथ…
हमें उससे एक बार मिला दो …!

उसके बहुत से एहसान हैं हमारे ऊपर। उससे मिलकर ,उसे आशीर्वाद देकर , …एहसानों का बोझ कुछ तो हल्का कर ले…
साहब के पिता जी ने कहा।ठीक है ..चारबाग उतरकर आप लोग हमारे साथ चलना!चारबाग से दोनों समूह अलग-अलग ऑटो में, मगर एक ही जगह के लिए रवाना हुए।
कमरे पर पहुंचते ही किन्नरों ने हीरा को आवाज देते हुए कहा….
हीरा देख..तुझसे कोई मिलने आया है। हीरा किसी तरह उठी… देखा तो सामने साहब जी का परिवार.. वह स्तब्ध रह गई और उन्हें एक तक देखने लगी! तभी अचानक उसे चक्कर आया और वह गिर गई ।
ओह …दौड़कर साहब ने उसे उठाया !बाकी किन्नर उसके लिए पानी ले आए .!गोद में सिर रखकर साहब की मां ने उसे प्यार से पानी पिलाया ..!

कुछ छींटे उसके चेहरे पर मारे …तो कुछ देर में हीरा को होश आ गया! मां की गोद में सिर रखकर कितना सुकून मिला आज। हीरा को बरसों बीत गए …इस गोद को छोड़े हुए!
इस ममतामई स्पर्श के लिए न जाने कितना इंतजार करना पड़ा ..! आज मैं तर गई।
सुंदरी तुम्हें क्या  हुआ ?
तभी साहब ने पूछा क्या ….हुआ हीरा ….तुम अचानक बीमार… चलो तुम्हें दवा दिला दें ।
अब दवा की कोई जरूरत नहीं साहब जी… अब तो मुझे वह सब कुछ मिल गया जो मैंने सोचा भी ना था..!
बापू क्या तुम मुझसे दूर ही खड़े रहोगे।  नहीं बेटी नहीं ….तू भी किसी की बेटी ही रही होगी… तुझे भी मां बाप का प्यार पाने का पूरा अधिकार है। देख मैं तेरे लिए क्या लाया हूं।
बाबू जी ने भगवान कृष्ण की मूर्ति उसे दी ..!
कितनी सुंदर है ना ।बाबू ….पर आप से सुंदर नहीं . आप सभी खुश है ना… बाबू और अम्मा तू भी खुश है ना …
मैंने अपना फर्ज निभाया…

अब मुझे मौत भी आ जाए तो कोई गम नहीं! भाभी तुम मेरी मां ,बापू ,भैया का ख्याल रखना।
यह गरीब जरूर है …पर दिल से बहुत पवित्र और अमीर हैं! प्यार से भाभी का हाथ पकड़कर हीरा ने उसको चूमा और अपने साथियों से कहा..

मेरे बक्से से वह गुड़िया ले आओ।साथियों ने हुआ गुड़िया उसे दे दी । उसने वह गुड़िया पार्वती को देते हुए कहा… भाभी ..यह गुड़िया मेरी भतीजी को दे देना .!
इतना कहते ही उसके प्राण पखेरू उड़ गए । शायद वह सभी से मिलने के लिए ही शरीर में रुके हुए थे ।

सभी लोगों ने उसकी दशा देखकर विलाप करना शुरू कर दिया ।पर किन्नरों ने कहा… आप लोग इस के मरने पर रोए नहीं ..!
इसे तो इस शरीर से मुक्ति मिल गई।जब सभी लोग शांत होकर चलने को हुए तो उन्होंने वह गुड़िया उठाई । और गौर से देखा तो चौक पड़े।

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देखों जी “किन्नर सुंदरी अपनी ही…. ?
अरे.. यह गुड़िया… साहब की मां .. इसे गौर से देख.. कुछ याद आया….??? नहीं तो।
अरे देख देख …..यह तो वही गुड़िया है।

जो मैंने अपनी रानीबिटिया के लिए बचपन में लाकर दी थी।अपनी रानी के लिए.. अरे हां… सच कहा आपने…
पर यह इसके पास कैसे .? कहीं यह हीरा…. मेरी रानी तो नहीं ….क्या इसी कारण यह हम सबको …अम्मा, बापू कहकर पुकारती रही!अरे रानी भी तो हमसे बचपन में यही कहा करती थी।
सुनो भाई यह तुम्हें कहां से मिली।

बाबूजी यह तो कानपुर की है।छोटे पर ही हम लोग इसे अपने साथ ले आए थे!

वह लोग अब समझ चुके थे कि हीरा कोई और नहीं उसकी अपनी बेटी रानी ही है ..!
जिसको इतना लाड प्यार से पाला वह किन्नर होने के कारण ….उनसे बिछड़ गई और मिली भी तो इस हाल में ..!
हम पहचान ना सके उसे..!
अपनी जुबान से बेटी ना कह सके…! उसने अपना कर्तव्य पूरा निभाया और हम… हम।सभी की आंखों में आंसू थे।
साहब भी समझ चुका था। हीरा उसकी बहन है..! उसने और पार्वती ने उसके चरण पकड़ लिए .!आंसुओं से उसके पैर गीले हो गए!
दीदी तुमने हमारे लिए क्या-क्या किया और हम …
” ईश्वर । तुम ऐसा खेल क्यों रचा? जो ?
कैसा खेल खेला ईश्वर ने हमारे साथ। मां-बाप के साथ सभी किन्नर भी हीरा के लिए आंसू बहा रहे थे।
साहब की मां ने कहा …प्रभु तू औलाद दे पर उसे किन्नर के रूप में कभी किसी मां को न देना ।
वरना उसके बच्चे कहां-कहां और कैसे-कैसे भटकते रहते हैं । उन्हें मां बाप का प्यार तो क्या समाज का प्यार भी नसीब नहीं होता।

वह प्यार के लिए हमेशा तरसते ही रहते हैं । उनके नसीब में सिवा  तानों और कहकहो के कुछ नहीं होता ।
सभी किन्नर मां की ऐसी दुख भरी बातें सुनकर उनसे लिपट कर रोने लगे।

मां ने सभी को प्यार से सांत्वना दी और कहा…
तुम लोग कभी कभी मिलने मेरे घर कानपुर आया करना जिससे हम सब रानी का कर्ज उतार सके! तुम्हें अपना प्यार और स्नेह दे सकें।
किन्नरों का ए कैसी परंपरा हैं ” जो ?
हीरा के दाह संस्कार की तैयारी किन्नर समाज द्वारा कर ली गई थी ।उसके पार्थिव शरीर को रिवाज के मुताबिक चप्पलों से पीटा गया ।
तथा साहब और उनके घर वालों से भी ऐसा करने का आग्रह किया गया। उनके हाथ इस रिवाज के लिए तैयार न थे, किंतु उन्हें फिर भी ऐसा करना पड़ा। जिसने हमारे लिए इतना कुछ किया ।

हम उसे चप्पल जूते मार कर विदा कर रहे हैं । हे भगवान हमें यह दिन क्यों दिखाया ।
क्या बीतती है। उन मां-बाप पर जिनके बच्चे किन्नर रूप में पैदा होते हैं। और उनका दाह संस्कार उन्हें देखना पड़ता है।
किन्नरों ने सभी से कहा… अब आप लोग प्रार्थना करें कि इसे अगला जन्म किन्नर का ना मिले ..!

सभी ने हीरा के लिए प्रार्थना की और दुखी मन से उसको विदा कर दिया। हमेशा हमेशा के लिए..दोस्तों किन्नरों का सम्मान करें वह भी किसी के बच्चे ही होते हैं।धन्यवाद दोस्तों 👋👋👋